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समकालीन परिवेश में “प्रदर्शन कला” का महत्व IMPORTANCE of PERFORMIMG ARTS in CONTEMPORARY ERA

IMPORTANCE of PERFORMIMG ARTS in CONTEMPORARY ERA समकालीन परिवेश में “प्रदर्शन कला” का महत्व 

 

“पक्षी कहते हैं चमन बदल गया

आकाश कहता है चाँद बदल गया

कह रही भारत की धरती

इंसान तो वही है पर अन्दाज़ बदल गया”|

समकालीन परिवेश में “प्रदर्शन कला” का महत्व IMPORTANCE of PERFORMIMG ARTS in CONTEMPORARY ERA
performing art ( स्टेज शो )

भारत कलाओं का देश माना जाता है और मानव के अस्तित्व  के साथ ही कला का अस्तित्व भी जुडा है अर्थात मानवीय जीवन की परंपराओं के साथ ही कलाओं की परंपरा सदियों पुरानी है तथा राष्ट्र की परंपरागत सांस्कृतिक  पहचान है| समयानुसार कला ने अनेक रूपों में इस धरती पर अपनी छाप छोडी है और निरंतर प्रगति  करते हुए सदैव जन-जन को तृप्त करती आ रही है तथा प्राचीन काल से ही मनुष्य की  दृढ़ इच्छाशक्ति  रही है कि वह अपने दैनिक  अनुभव, विचार, सुविज्ञता और ज्ञान को संचारित करें इसलिए  वह इन्हें भविष्य में आने वाली पीढियों के लिए सुरक्षित रखता आया है | उसकी यह इच्छा कई प्रकार से अपने आप में उभरकर सामने आई है|

“Man can express him self through Art.”

-Rabindranath Tagore

अर्थात  कला के माध्यम से ही मानव अपने भावों को अभिव्यक्त  करता है| प्राचीन काल से ही कला के रूप, माध्यम एवं अभिव्यक्ति  के उपकरण पृथक-पृथक रहे हैं किंतु सभी का एक मूल उद्देश्य भावनाओं की साकार अभिव्यक्ति कर जनमानस के हृदय को आनंदित करना है| यह कलाएं हमारी संस्कृति  का मूल तत्व है| इन्हीं कलाओं से संस्कारों का निर्माण होता है|

गुहा चित्रों से आरंभ हुई मानव की कला पिपासा ललित कला के अनेक माध्यमों में नित नए प्रयोगों तक आ पहुंची है | विभिन्न माध्यमों में ललित कला का एक विशिष्ट रूप भी है, जिसमें  कलाकार दर्शकों  के लिए अपने काम का प्रदर्शन करते हैं| इसे “प्रदर्शन कला” कहा जाता है|

“The challenge to pass ideas, themes and experiences into the mind and bodies of the watchers, so that they may be changed by the experience”. Lorna Marshall (The Body Speaks)

प्रदर्शन करने वाली कला वह कला रूप है जो कलाकार के स्वयं के शारीरिक  हावभाव, चेहरे के भाव और उपस्थिति  को कुछ भौतिक वस्तु  बनाने के माध्यम के रूप में उपयोग करता है| प्रदर्शन कला का अस्तित्व भी अतीत प्राचीन है जब आदि मानव को भाषा का ज्ञान नहीं था तो वह अपने शारीरिक हावभाव, चेहरे के भाव आदि के  द्वारा ही अपने भावों को अभिव्यक्त करते थे किंतु युग की चट्टान पर अपने पद चिन्ह छोड भारतीय कला निरंतर आगे बढ़ती रही है|समय की सीढियां चढ़ते चढ़ते आज हम उस मोड पर खडे हैं जहां से यह ज्ञात होता है कि भारतीय कलाकारों ने निरंतर नवीन प्रयासों से कला को नवीन आयाम दिया है| आज कला छोटे शहर या गांव में दबकर नहीं मरती अपितु युग के परिवर्तित प्रत्येक चरण में स्वयं को परिष्कृत करती है |

समकालीन परिवेश में “प्रदर्शन कला” का महत्व IMPORTANCE of PERFORMIMG ARTS in CONTEMPORARY ERA
“प्रदर्शन कला”

समकालीन परिवेश में “प्रदर्शन कला” का महत्व IMPORTANCE of PERFORMIMG ARTS in CONTEMPORARY ERA

 

 

इसी संदर्भ में भारतीय कला को नित  नवीन स्वरूप प्रदान करने के लिए आज भारतीय कलाकारों का रुझान “प्रदर्शन कला” की ओर बढ़ता जा रहा है | अनेक कलाकारों का समूह इस दिशा में सक्रिय  है और नित नवीन प्रयोग कर रहा है| प्रदर्शन कला की इस नवीन दिशा में “खोज 1999” की  कार्यशाला को गहन संवाद और बहस के द्वारा चिन्हित  किया गया और उत्पादित अधिक काम को एक मजबूत सामाजिक  , राजनीतिक  विवेक द्वारा रेखांकित किया गया|

सीकरी बाग” मोदीनगर में प्रसिद्ध कलाकार सुबोध गुप्ता एवं 24 कलाकारों के साथ “खोज 1999” को मजबूत कलात्मक, राजनीतिक और काव्यात्मक आवाजों के साथ पैक किया गया जिसमें कलात्मक हस्तक्षेप  के साथ बहस हुई साथ ही 3 वषों में इन कार्यशालाओं के माध्यम से “खोज” ने कलात्मक स्वतंत्रता और प्रयोग के लिए एक मंच प्रदान करने के लिए विभिन्न कला रूपों को “प्रदर्शन कला” के माध्यम से एकीकृत करने का प्रयास किया है|

समकालीन परिवेश में “प्रदर्शन कला” का महत्व IMPORTANCE of PERFORMIMG ARTS in CONTEMPORARY ERA
समकालीन परिवेश में “प्रदर्शन कला” का महत्व IMPORTANCE of PERFORMIMG ARTS in CONTEMPORARY ERA

इसके अतिरिक्त  आज के समकालीन परिवेश में आज के युवा कलाकार जैसे- मुरारी झा, अनुपम सैकिया, चित्रा गणेश, मिट्ठू सेन, शिलो शिव सुलेमान ने अपने निरंतर नवीन प्रयासों से प्रदर्शन कला को नवीन स्वरूप प्रदान कर रहे हैं,क्योंकि  आज की कला को जनता की चित्तवृत्ति  और संस्कृति तथा उसकी आशाओं और आकांक्षाओं से जोडने की जरूरत है जिससे कला का सही रूप समाज के सामने प्रस्तुत  हो ताकि  समाज उसका भरपूर आनंद ले सकें| इसी दिशा में अग्रसर होते हुए “प्रदर्शन कला” अहम भूमिका निभा रही है | आज के परिवेश में प्रदर्शन कला अपने प्रारंभिक दौर से निकलकर स्वतंत्र और सशक्त  माध्यम के रूप में सामने आई है तथा स्वयं के समय में प्रवेश पाकर नवीन धारणाओं के तहत बहुत सी नई खोज की गई गतिविधियों और संवेदनशील तकनीकों को अपने में समाहित कर अपना विस्तार कर रही है |

इस प्रकार हम कह सकते हैं कि प्रदर्शन कला अपनी नई अर्थ , छवियों, प्रयोगों और संभावनाओं के कारण ही युवा कलाकारों तथा कला विद्यार्थीयों को आकर्षित  करती है क्योंकि वर्तमान जीवन की विविधताओं को ध्यान में रखते हुए “प्रदर्शन कला” एक ऐसा भवन है जिसमें अनेक कक्ष  हैं और वर्तमान  कलाकार अपने अथक परिश्रम और पूर्ण  निष्ठा  से “प्रदर्शन कला” को श्रेष्ठ  बनाने के लिए निरंतर प्रयासरत हैं।

Kamini chauhanAuthor : Kamna Chouhan   (M. A, B.Ed, UGC Net.) 

Assistant professor in Institute Of Fine Arts , Modinagar .

Seminar -Participated and paper present in 15 seminar, Participated and paper published in two International Seminar, and paper published in 6 books two are international. Participated in 10 workshop and 7 Exhibition.

Achievements – Honour And award “Rachana Dharmi Award “,

Honour by City vocational public school on the occasion of 150 Birth anniversary of Rabindranath Tagore. Anmol Ratan award by Alumni association in R. G. P.G college meerut. , Invited as a resource person for the demonstration of Wood block print. Special jury award by Srijanlok Art Foundation.

Live inMeerut -Uttar Pardesh

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