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NANDLAL BOSE : The Great Indian Painter

नंदलाल बोस ( 3 दिसंबर 1882 – 16 अप्रैल 1966 )

इस चित्रकार को विशेष तौर पर उनकी “भारतीय शैली” के लिए जाना जाता था। नंदलाल बोस आधुनिक भारतीय कला के अग्रदूतों और प्रासंगिक आधुनिकतावाद के प्रमुख व्यक्ति थे । उनकी कला में भारतीय संस्कृति की आत्मा बसती है। जिनकी पेंटिंग सती को देखकर मैं नैशनल गैलरी ओफ़ मॉडर्न आर्ट (NGMA ) में अपने दिल के ग़ुबार को नहीं रोक पाया और आँखो से अश्रु धारा बह निकली। आज उनकी 54 वीं पुण्यतिथि पर उस विराट कलाकार को शृद्धासुमन स्वरूप उनके बारे में हृदय की कलम से लिखे कुछ शब्द सुमन अर्पित करता हूँ।

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आज ज़्यादातर आलोचक भारत के सबसे महत्वपूर्ण आधुनिक चित्रों में नंदलाल के चित्रों को ही मानते हैं। 1976 में, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, संस्कृति विभाग, भारत सरकार ने अपने सबसे बेहतरीन कार्यों को “नौ कलाकारों” ( “Nine Masters: Rabindranath Tagore, Amrita Sher-Gil, Jamini Roy, Nandalal Bose, Raja Ravi Varma, Gaganendranath Tagore, Abanindranath Tagore, Sailoz Mookherjea, and Nicholas Roerich.”) के रूप में घोषित किया, जिनके काम, keप्राचीन वस्तुएं  नहीं थे, बल्कि उन्हें उनके कलात्मक और सौंदर्य मूल्य के संबंध में “कला के खजाने के रूप में माना गया।

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नंदलाल बोस अबनिंद्रनाथ टैगोर के शिष्यथे । वह अबनिंद्रनाथ टैगोर, जापानी वाश और अजंता के भित्ति चित्रों से प्रभावित थे; उनकी क्लासिक कृतियों में भारतीय पौराणिक कथाओं, महिलाओं और ग्राम जीवन के दृश्यों के चित्र शामिल हैं।

नंदलाल बोस का जन्म 3 दिसंबर 1882 को बिहार राज्य के मुंगेर जिले के खड़गपुर के एक मध्यम वर्गीय बंगाली परिवार में हुआ था।उनके पिता पूर्ण चंद्र बोस उस समय दरभंगा एस्टेट में काम करते थे। उनकी मां खेतरामोनी देवी युवा नंदलाल के लिए खिलौने और गुड़िया बनाने में निपुण थीं। अपने शुरुआती दिनों से नंदलाल ने मॉडलिंग की तस्वीरों में दिलचस्पी लेना शुरू किया और बाद में पूजा पंडालों को सजाने लगे।

1898 में, पंद्रह साल की उम्र में, नंदलाल सेंट्रल कॉलेजिएट स्कूल में अपनी हाई स्कूल की पढ़ाई के लिए कलकत्ता चले गए। 1902 में अपनी परीक्षाओं को पास करने के बाद, उन्होंने उसी संस्थान में कॉलेज की पढ़ाई जारी रखी। जून 1903 में उन्होंने एक पारिवारिक मित्र की बेटी सुधीरादेवी से शादी की। नंदलाल कला का अध्ययन करना चाहते थे, लेकिन उन्हें उनके परिवार द्वारा अनुमति नहीं दी गई थी। अपनी कक्षाओं में पास के लिए निश्चित योग्यता प्राप्त करने में असमर्थ, नंदलाल अन्य कॉलेजों में चले गए, 1905 में प्रेसीडेंसी कॉलेज में वाणिज्य (commerce) अध्ययन करने के लिए शामिल हुए। बार-बार फेल होने के बाद, आख़िर में उन्होंने अपने परिवार को कलकत्ता के स्कूल ऑफ आर्ट में कला का अध्ययन करने के लिए राजी कर लिया।

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1909 में एक युवा कलाकार के रूप में जब वह 26 वर्ष के थे , नंदलाल बोस अजंता गुफाओं के भित्ति चित्रों से गहराई से प्रभावित थे।जब उसने अजंता के सुदूर स्थल पर बौद्ध मठों की दीवारों पर बने भित्ति चित्रों की नकल की थी। 20 वीं शताब्दी के आरंभ में भारत में नये पुनर्जागरण के रूप में बंगाली नवजागरण काल का उदय हुआ । वह शास्त्रीय भारतीय संस्कृति को पुनर्जीवित करने के लिए कलाकारों और लेखकों के एक अंतरराष्ट्रीय सर्कल का हिस्सा बन गए थे; जिस सर्कल में पहले से ही ओकाकुरा काकुज़ो, विलियम रोथेनस्टीन, योकोयामा ताइकन, क्रिस्टियाना हेरिंगम, लॉरेंस बिनियन, अबनिंद्रनाथ टैगोर, और सेमिनल लंदन आधुनिकतावादी कलाकार  एरिक गिल और जैकब एपस्टीन शामिल थे।

 

बीसवीं शताब्दी के शुरुआती वर्षों में, पारंपरिक जापानी संस्कृति ने एक पुनरुत्थान किया, जिसने न केवल देश की सीमाओं से परे अपना प्रभाव बढ़ाया, बल्कि वैश्विक आधुनिकता के चरित्र को मौलिक रूप से प्रभावित किया क्योंकि यह शहरों के कला और साहित्य में दूर के रूप में उभरने लगा था। बोस्टन और लंदन विशेष रूप से कलकत्ता,। अपने गुरु टैगोर की तरह, उन्होंने अपने शुरुआती काम में वाश तकनीक के लिए जापानी टेकनिक का अभ्यास किया ,उनके प्रसिद्ध चित्र “सती” में उन्होंने हिंदू देवता शिव की पत्नी का इतनी भव्यता से भावों को उकेरा कि आप उस छवि की अशांत प्रकृति को लगभग अनदेखा कर देंगे । उसमें सती ने अपनी यौगिक शक्तियों का इस्तेमाल अपने शारीरिक रूप से छुटकारा पाने के लिए खुद का अंग भंग कर लिया था ।उस चित्र में शिव की मनोदशा का अद्भुत चित्रण किया।

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हर क्रांति का अपना संदर्भ होता है।
बोस ने 1940 के दशक में अपने शुरुआती कार्यों को फिर से वॉश स्टाइल में पुनर्स्थापित किया । इन्हीं वर्षों में, मैटिस और अन्य अपने कैनवस के रंग में क्रांतिकारी बदलाव कर रहे थे, और पिकासो ( Picasso )और बराक (Braque) अपने क्यूबिस्ट चित्रों में स्थान को विशेष तरीक़े से पुनर्स्थापित कर रहे थे।इधर बंगाल में अबनिंद्रनाथ टैगोर और नंदलाल बोस के चित्रों ने राजा रवि वर्मा जैसे कलाकारों की पश्चिम शैली के रूढ़िवादी यथार्थवाद से स्वतंत्रता की घोषणा थी ।
उनकी प्रतिभा और मूल शैली को सिस्टर निवेदिता व गगनेंद्रनाथ टैगोर जैसे कलाकारों और आनंद कोमारस्वामी (Ananda Coomaraswamy ) और ओ सी गांगुली ( O. C. Ganguli ) जैसे प्रसिद्ध कला समीक्षकों ने पहचाना। कला के इन प्रेमियों ने महसूस किया कि चित्रकला के विकास के लिए वस्तुनिष्ठ आलोचना आवश्यक थी ।और आगे चलकर इन्होंने इंडियन सोसाइटी ऑफ ओरिएंटल आर्ट की स्थापना की।

 

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रवींद्रनाथ टैगोर, जिन्हें 1913 में उनकी कविताओं की पुस्तक गीतांजलि के लिए साहित्य का नोबेल पुरस्कार मिला था। 1919 में, उन्होंने बोस को कला विद्यालय के प्रमुख के रूप में बुलाया,वह 1922 में टैगोर के अंतर्राष्ट्रीय विश्वविद्यालय शांति निकेतन में कला भवन (कला महाविद्यालय) के प्राचार्य बने। जहां उन्होंने 1951 तक पढ़ाया। जब उन्होंने अध्यापन से संन्यास लिया, तो उनकी कला और भी अधिक भव्य , अधिक रहस्यमय और देखने वाली बन गई जिसे उन्होंने जीवन की लय कहा, जिसकी जीवनी शक्ति ने चित्रों की पूरी रूमानी दुनिया को उत्पन्न किया।
रवींद्रनाथ टैगोर ने कहा था कि नंदलाल अपने कार्य के लिए तैयार हैं , “आइए हम अपनी कल्पना शक्ति को लाएं और एक नई दुनिया बनाएं। ।”
इससे टैगोर ने बोस का विश्वास लौटा दिया, फिर रवींद्रनाथ टैगोर द्वारा डांस ड्रामा के एक दृश्य के आधार पर उन्होंने 1938 में अपनी पेंटिंग “अर्जुन” जैसी बेहतरीन पेंटिंग बनाने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने प्रसिद्ध महाकाव्य “महाभारत” के नायक अर्जुन एक जंगल में जगा हुआ दर्शाया कि ,बोस ने इसे बहुत खूबसूरती से चित्रित किया है इसमें अर्जुन का शरीर चित्र में सतह की लंबाई तक फैला हुआ है।।
बोस ने अपने इस चित्र पर गर्व किया जो कि होना भी चाहिए था ।

 

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नंदलाल बोस भारतीय कला के इतिहास में एक विशेष स्थान रखते हैं, जो स्थान पुनर्जागरण के इतिहास में राफेल और ड्यूरर की जोडी रखती है। उनकी मौलिकता एक नई कला आंदोलन के निर्माण के लिए तैयार किए गए विचारों की क्षमता से लबरेज़ थी।। और ड्यूरर की तरह उन्होंने एक अपरिवर्तनीय विश्लेषणात्मक दिमाग के साथ भक्ति और जुनून की सीमा को एक कर दिया, जिसमें उन्हें अलग-अलग कला परंपराओं की परतों को खोलने के लिए मजबूर किया और उनके वाक्यात्मक तर्क को भी उजागर किया, और उन्हें भारतीय कलाकारों की एक नई पीढ़ी के लिए सुलभ बनाया।

लेकिन उन्होंने ऐसा चुपचाप और आत्मचिंतन के साथ किया। उन्होंने कला को एक बड़े आध्यात्मिक खोज की अभिव्यक्ति के रूप में देखा, उनके काम का महत्व भारतीय कला संसार में पूरी तरह से समझा जा सकता है।

 

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जवाहरलाल नेहरू द्वारा भारत रत्न और पद्मश्री सहित भारत सरकार के पुरस्कारों के लिए प्रतीक चिन्हों को स्केच करने के लिए भी प्रसिद्ध थे।
उन्होंने भारत के संविधान को चित्रित किया था । नंदलाल बोस ने अपने शिष्य राममनोहर के साथ, भारत के संविधान की मूल पांडुलिपि को सुशोभित / सजाने ( Illustrate ) का ऐतिहासिक कार्य किया।यह पुस्तक भारतीय गणराज्य के संविधान के 1,000 फोटोलिथोग्राफ़िक प्रतिकृतियों में से एक है, जो 26 नवंबर, 1950 को संविधान सभा द्वारा अनुमोदित होने के बाद 26 जनवरी, 1950 को लागू हुई थी।
पुस्तक की मूल प्रति भारतीय संसद के पुस्तकालय में एक विशेष हीलियम से भरे बॉक्स में रखा गया है। पुस्तक में सुलेख प्रेम बिहारी नारायण रायज़ादा द्वारा किया गया था। यह संविधान देहरादून से प्रकाशित द्वारा प्रकाशित किया गया था । इसकी मूल प्रति व चित्रों को आप इस लिंक पर देख सकते हैं https://www.wdl.org/en/item/2672/view/1/1/  ।

 

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      लीनोकट  Nandlal_Bos

 

शांतिनिकेतन में बोस को कला विद्यालय में लाने के अलावा, टैगोर दूसरे तरीके से भी कलाकार नंदलाल बोस के जीवन के लिए महत्वपूर्ण थे। उन्होंने उन्हें मोहनदास करमचंद ( महात्मा ) गांधी से मिलवाया।
नमक पर ब्रिटिश कर का विरोध करने के लिए महात्मा गांधी की गिरफ्तारी के 1930 के अवसर को चिह्नित करने के लिए, बोस ने एक कर्मचारी के साथ गांधी के सफेद लीनोकट प्रिंट पर एक काले रंग के चित्र का निर्माण किया।
यह अहिंसा आंदोलन के लिए प्रतिष्ठित छवि बन गई थी ।जो आज दिल्ली में नेशनल गैलरी ऑफ़ मॉडर्न आर्ट ने अपने संग्रह में जो 7000 कृतियों में शामिल है। जिनमें  दांडी मार्च के काले और सफ़ेद रंग के लीनोकट को शामिल किया गया है, जिसमें महात्मा गांधी का चित्रण किया गया है, और उसके बाद 1938 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के हरिपुरा अधिवेशन में उन्होंने महात्मा गांधी के अनुरोध पर सात पोस्टरों का एक सेट और बनाया।
नंदलाल बोस एकमात्र ऐसे कलाकार बने जिन्हें आध्यात्मिक और राजनीतिक आंदोलनों को चित्रों में ईमानदारी के साथ चित्रित किया

 

 

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उन्होंने इस विश्वास को बहुत मज़बूती से अपने चित्रों में पुष्ट किया कि भारत की पहचान अपने ग्रामीण संस्कृति व गांवों से काफी हद तक जुड़ी हुई है ,ये लोग जो ब्रिटिश उपनिवेशवादियों से कम जुड़े हुए थे।और आदर्श ग्रामीण लोक, जैसा कि “न्यू क्लाउड्स” (1937),में उनके चित्र जो कागज़ पर बना हुआ एक काम है जिसमें गाँव की लड़कियों को पॉम के बीच चलते हुए दिखाया है, जिससे उनके बीच यह दृश्य एक तरह का अद्भुत सौहार्द बनता है जो प्रकृति के साथ समन्वय पैदा करता है। इसी तरह 1928 में बनाया हुआ उनका चित्र”विलेज हट्स” वाटर कलर में नम्र व आकर्षक चित्रकला का प्रदर्शन करता है।

 

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Postal Stamp_Nandlal_Bose

 

उनके कुछ प्रसिद्ध छात्रों में बिनोद बिहारी मुखर्जी, रामकिंकर बैज,राममनोहर सिन्हा, केजी सुब्रमण्यन, ए रामचंद्रन, हेनरी धर्मसेना, प्रतिमा ठाकुर, रामानंद गोपोपाध्याय, सोवन सोम, जहार दासगुप्ता, सबिता ठाकुर, मेन्जा स्वग्नेश, दिनकर कौशिक, अमृतलाल वेगड़, गौरांग चरण और कोंडापल्ली शेषगिरी राव आदि थे।
इसके अलावा श्रीलंका के उनके छात्रों में से A.D.Jayathilake एक थे और उन्हें अंतिम बैच (1948-1952) में के तहत अध्ययन करने का अवसर मिला। डॉ नंदलाल बोस की विशिष्ट रूप से दो पेंटिंग; “अर्जुन ट्री” और “मैंगो ट्री” वर्तमान में अपने श्रीलंकाई छात्र (A.D.Jaythilake) के पास में रखी हैं।
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Nandlal_Bose_प्रतीक्षा
नंदलाल बोस के सम्मान :
जिन्होंने भारतीय कला पर एक बड़ी छाप छोड़ी, वे 1907 में स्थापित इंडियन सोसाइटी ऑफ़ ओरिएंटल आर्ट द्वारा दी गई छात्रवृत्ति के पहले प्राप्तकर्ता थे।
1956 में, वह ललित कला अकादमी, भारत की राष्ट्रीय कला अकादमी के फैलो चुने जाने वाले दूसरे कलाकार बन गए।
1954 में, नंदलाल बोस को पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया था।
1957 में, कलकत्ता विश्वविद्यालय ने मानद डी.लिट की उपाधि प्रदान की । और विश्वभारती विश्वविद्यालय ने उन्हें ‘देशोत्तम’ की उपाधि से सम्मानित किया।
कलकत्ता की ललित कला अकादमी ने नंदलाल को रजत जयंती पदक से सम्मानित किया।नंदलाल बोस को टैगोर जन्म शताब्दी पर बंगाल की एशियाटिक सोसाइटी द्वारा 1965 में एक पदक प्रदान किया गया था।
भारतीय पोस्ट ने इनके उपर डाक टिकट भी जारी किए जिनमे 1967 में 15 पैसे व
5 दिसम्बर 1985 को प्रतीक्षा पेंटिंग पर 100 पैसे का डाक टिकट जारी हुआ।

16 अप्रैल 1966 को 84 वर्ष की उम्र में कलकत्ता शहर में उनका निधन हो गया।

पर वे विश्व कला इतिहास में सितारे की तरह चमकते रहेंगे।

 

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आपके कामेंट व प्रतिक्रियाओं के इंतज़ार में …..
पागलबाबा।  ( Email- paagalbaba.com@gmail.com )

 

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