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holi and Artist

Holi and Artist

कलाकारों ने सदियों से, भारतीय कला ने रंगों के त्योहार होली में अपने रंगों को जोड़ा है। इसकी शुरुआत राजस्थानी और कांगड़ा लघु चित्रों से हुई। खासकर कृष्ण और राधा की परिक्रमा करने वाले होली के दृश्यों को लघु चित्रों में बड़े पैमाने पर चित्रित किया गया था। पर अब ये काम अब कलेक्टरों के पास  और संग्रहालय अभिलेखागार में पाए जाते हैं। 

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यामिनी राय (होली )

होली ने भी शुरुआती बंगाल तेल चित्रों  में अपना रास्ता बनाया। इस अवधि के चित्रकार, जिन्होंने कभी-कभी गुमनाम रूप से काम किया, इन सभी ने कृष्ण-राधा थीम पर ध्यान केंद्रित किया। इनमे यामिनी रॉय व चुगताई प्रमुख है। के शीर्षक “कृष्ण वादन होली” का यह सीमित संस्करण  बंगाल के प्रसिद्ध भोज चित्रों से प्रेरित कलाकार की हस्ताक्षर शैली में चित्रित किया गया है। यामिनी रॉय के रंग और निर्दोष ब्रश स्ट्रोक के शानदार उपयोग ने उनके विषयों को जीवंत बना दिया। मास्टर के अधिकांश काम अब दुनिया भर के संग्रहालयों और भारत में रखे गए हैं या निजी संग्रह में हैं जो उन्हें दुर्लभ बनाते हैं।

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चुगताई बंगाल स्कूल के एक बड़े कलाकार थे।उन्होंने होली का बड़ा सुंदर चित्रण किया है।चुगताई 1947 के बँटवारे के समय पाकिस्तान चले गए।वहाँ पर उनको राजकीय सम्मान ज़रूर मिला पर वे उस देश में जल्द भुला दिए गए जिसमें उन्होंने रहने का फ़ैसला किया था। लेकिन भारत के विशाल हृदय के जनमानस ने आज भी चुगताई को ज़िंदा रखा है।

विषय का उपयोग आधुनिक कलाकारों द्वारा भी किया गया  है। हुसैन, बेंद्रे, हेब्बार, रावल, रामानंद बंदोपाध्याय और बिकाश भट्टाचार्जी, अन्य समकालीन चित्रकारों के द्वारा होली की अपनी व्याख्याएं हैं। हुसैन ने इस भारतीय उत्सव पर कई चित्रों को तेल, जल-रंगों और अन्य माध्यमों में निष्पादित किया है। बिकाश भट्टाचार्जी ने होली को एक टी के रूप में बनाने वाले बड़े तेल चित्रों को उतारा है।

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paagalbabaभारतीय चित्रकार एम एफ हुसैन ने भी रंग के इस कार्निवल को दर्शाते हुए कुछ ऊर्जावान कोणों का मंथन किया

संयोग से होली पर केंद्रित प्रारंभिक काल के चित्र बेहद यथार्थवादीऔर आलंकारिक हैं, पर वर्तमान समय की रचनाएं बहुत ही समकालीन  हैं और अक्सर इस विषय के एक सूक्ष्म सार  को दर्शाती हैं। मूल रूप से,चित्रो व  रंगों के माध्यम  कृष्ण और राधा रहे हैं, जो गोपियों और गोपियों से घिरे हुए हैं व एक दूसरे को रंगों से सराबोर कर रहे हैं।
कई जगह पर  गाँव के दृश्य भी सामने आते हैं जो बड़ी संख्या में गोपियो को दर्शाते हैं ।

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चित्रकारों के अलावा होली के बहुत बड़े प्रेमी थे राजकपूर, र्ष 1952 से ही आरके स्टूडियो में जम कर होली खेली जाती थी।।जिनके आर के स्टूडियो में  हर साल बड़े ही मस्ती के माहोल में होली की मस्ती का रंग उड़ता था। ओर मुंबई के लगभग सभी बड़े कलाकार जमा हो जाते थे, पर अब मुंबई में राजकपूर भी नहीं रहे ओर आर के  स्टूडियो साल 2019 में गोदरेज प्रोपर्टीज लिमिटेड ने खरीद लिया और अब इस पर शॉपिंग प्लाजा का निर्माण किया जा रहा है।

राज कपूर के स्टूडियों की होली में शामिल होना उस ज़माने का हर छोटा बड़ा सितारा अपनी शान समझता था। सिर्फ़ देव आनंद नहीं आते थे, क्योंकि उन्हें रंगों से परहेज था।

लेखक : पवन पागल   83 9596 7979        ईमेल:  pawan.paagal@gmail.com

 

 

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